
हाय दोस्तों! कल्पना कीजिए, रामू काका का दिल का दौरा पड़ा है। परिवार के पास आयुष्मान भारत का गोल्डन कार्ड है, जो उन्हें 5 लाख रुपये तक का कैशलेस इलाज दिलाने का वादा करता है। लेकिन, जब वे अपने शहर के एक बड़े निजी अस्पताल पहुंचे, तो उन्हें वापस लौटना पड़ा। “सर, हम आयुष्मान भारत के मरीज नहीं ले रहे।” यह सिर्फ रामू काका की कहानी नहीं है, 2026 में यह लाखों परिवारों की हकीकत बनती जा रही है। आज के इस आर्टिकल में, हम इसी Ayushman Bharat Hospital Refusal के संकट की गहराई में जाएंगे और जानेंगे कि आखिर बड़े प्राइवेट अस्पताल मना क्यों कर रहे हैं, और आपके पास क्या विकल्प बचते हैं।
आयुष्मान भारत योजना के तहत कैशलेस इलाज में बड़े निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों को अस्वीकार करने की घटनाएं 2026 में एक ‘गंभीर स्वास्थ्य संकट’ के रूप में उभरी हैं, जिससे ‘लाखों लाभार्थियों की पहुंच प्रभावित’ हो रही है। यह Ayushman Bharat Hospital Refusal का मुद्दा सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उन करोड़ों गरीब परिवारों की जिंदगी से जुड़ा हुआ है, जिनकी एकमात्र उम्मीद यह योजना है।
Ayushman Bharat: अस्पतालों की चुनौतियाँ
Insight: लगभग आधे अस्पताल (45%) सिर्फ इसलिए मरीजों को मना करते हैं क्योंकि उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलता।
अंदर की सच्चाई: अस्पताल ‘ना’ कहने पर मजबूर क्यों हैं?
1. ‘कागजी दर’ बनाम ‘जमीनी लागत’ का संघर्ष
आइए सबसे पहले इस बात को समझते हैं कि आखिर Ayushman Bharat Yojana के तहत अस्पतालों को क्या दिक्कत आ रही है। सरकार ने हर बीमारी के इलाज के लिए एक पैकेज दर तय की है। मान लीजिए, हार्ट की बाइपास सर्जरी के लिए यह दर लगभग 1.5 लाख रुपये है। लेकिन अस्पताल की असली लागत क्या है? इसमें सर्जन की फीस, एनेस्थीसिया, हार्ट का स्टेंट (जो अक्सर 50-70 हजार का होता है), आईसीयू का खर्च, दवाइयां, नर्सिंग चार्जेज सब कुछ शामिल है। सरकारी स्वास्थ्य योजना का यह पैकेज अक्सर इन सब खर्चों को कवर ही नहीं कर पाता।
सीधे शब्दों में कहें तो, अस्पताल को हर मरीज पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। बड़े प्राइवेट अस्पताल जहां अपनी सुविधाओं और डॉक्टरों के लिए प्रीमियम चार्ज करते हैं, उनके लिए यह नुकसान और भी ज्यादा है। हॉस्पिटल पेमेंट इश्यू की यही जड़ है – कागज पर बनी दर और जमीन पर होने वाली असली लागत के बीच का बड़ा फासला।
2. 90 दिनों का इंतजार? भुगतान की लंबी प्रक्रिया
अगर दर कम भी है, तो कम से कम भुगतान तो समय पर मिल जाए! लेकिन यहां तो दूसरी बड़ी समस्या यह है कि भुगतान आने में ही महीनों लग जाते हैं। अस्पताल मरीज का इलाज करता है, क्लेम जमा करता है, उसकी जांच होती है और फिर अगर सब ठीक रहा तो भुगतान मिलता है। यह पूरी प्रक्रिया कई बार 60 से 90 दिन, यानी 3 महीने तक खींच जाती है।
यह देरी अस्पतालों की ‘कैश फ्लो’ चक्र को तोड़ देती है। एक बड़े अस्पताल को महीने में लाखों रुपये के बिल, स्टाफ की सैलरी, मेडिकल सप्लाई का भुगतान करना होता है। ऐसे में, अगर सरकारी भुगतान ही लटका रहे, तो अस्पताल चलाना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि ‘सरकार द्वारा तय दरों में देरी से भुगतान और अस्पतालों की लागत संरचना के बीच अंतर’ ने संकट को गहरा कर दिया है।
3. ‘कैशलेस’ का मतलब ‘कैश डिमांड’ कैसे बन गया?
यह सबसे दुखद पहलू है। आयुष्मान भारत योजना का मूल मकसद था गरीब को फाइनेंशियल स्ट्रेस से बचाना, ताकि वह बिना पैसे की चिंता किए इलाज करा सके। लेकिन अब क्या हो रहा है? कई अस्पताल मरीज से सीधे कह रहे हैं, “हम आयुष्मान भारत लेते हैं, लेकिन पहले 50 हजार रुपये जमा कराइए।” यह पूरी तरह से ‘कैशलेस’ उपचार के मूल सिद्धांत के विपरीत है। बाहरी स्रोत का सीधा उल्लेख: ‘मरीजों से अग्रिम नकद भुगतान की मांग… जो ‘कैशलेस’ उपचार के मूल सिद्धांत के विपरीत है’। यह स्थिति उस गरीब लाभार्थी के लिए सबसे बड़ा झटका है, जिसके पास इलाज के नाम पर कुछ भी खर्च करने को नहीं है।
दोहरी मार: मरीजों का संकट और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ
लाभार्थियों के सामने विकल्पों की कमी
अब सोचिए, अगर एक बड़ा, नामी प्राइवेट अस्पताल आपको इलाज से मना कर देता है, तो आपके पास क्या विकल्प बचते हैं? पहला विकल्प: किसी छोटे या कम सुविधाओं वाले एम्पैनल्ड अस्पताल में जाएं, जहां शायद उन्नत उपकरण या विशेषज्ञ डॉक्टर न हों। दूसरा विकल्प: सरकारी अस्पताल की लंबी प्रतीक्षा सूची में अपना नाम लिखवाएं और हफ्तों, कभी-कभी महीनों इंतजार करें।
दोनों ही स्थितियां गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज के लिए जोखिम भरी हैं। समय पर सही इलाज न मिल पाना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है। यह संकट मरीजों को एक ऐसे दुविधापूर्ण मोड़ पर ला खड़ा कर रहा है, जहां उनके पास कार्ड होते हुए भी गुणवत्तापूर्ण इलाज पाना मुश्किल हो रहा है।
सरकारी अस्पतालों पर अतिरिक्त दबाव
जब प्राइवेट अस्पताल मरीज लेने से कतराने लगेंगे, तो जाहिर सी बात है कि भीड़ सरकारी अस्पतालों की तरफ बढ़ेगी। हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पहले से ही डॉक्टरों, नर्सों, बेड और उपकरणों की कमी से जूझ रही है। ऐसे में, अगर आयुष्मान भारत के लाखों नए मरीज भी इन्हीं अस्पतालों की ओर रुख करेंगे, तो सिस्टम पर दबाव असहनीय हो जाएगा। बाहरी स्रोत के अंतिम भाग का उपयोग करें: ‘इस संकट ने सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव बढ़ा दिया है…’ यह दोहरी मार है – एक तरफ मरीज बेसहारा, दूसरी तरफ सरकारी अस्पताल टूटने की कगार पर।
आंकड़ों में समझें: PMJAY दरें बनाम वास्तविकता
| उपचार | PMJAY पैकेज दर | दावा की गई औसत लागत | कमी (शॉर्टफॉल) |
|---|---|---|---|
| कोरोनरी आर्टरी बाईपास सर्जरी (CABG) | ₹1,40,000 – ₹1,70,000 | ₹2,50,000 – ₹3,50,000 | ₹80,000 – ₹1,80,000 |
| हिप रिप्लेसमेंट | ₹90,000 – ₹1,10,000 | ₹1,50,000 – ₹2,20,000 | ₹40,000 – ₹1,10,000 |
| कैंसर की कीमोथेरेपी (6 साइकिल) | ₹50,000 – ₹80,000 | ₹1,00,000 – ₹1,80,000 | ₹20,000 – ₹1,00,000 |
इस टेबल को देखकर आप समझ सकते हैं कि अस्पतालों का दर्द कहां है। हर मरीज पर हजारों से लाखों रुपये का नुकसान। अब एक बड़े अस्पताल पर सालाना हजारों आयुष्मान भारत मरीज आते हैं। गणना करें तो यह नुकसान सालाना करोड़ों रुपये में पहुंच जाता है। छोटा सा दिखने वाला यह अंतर ही अस्पतालों के लिए आर्थिक रूप से अस्थिर करने वाला साबित हो रहा है।
रास्ता किधर है? समाधान के प्रयास और आपकी भूमिका
सरकार और अस्पतालों की बातचीत: क्या हल निकलेगा?
अच्छी खबर यह है कि सरकार इस गंभीर समस्या को हल्के में नहीं ले रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने अस्पतालों, बीमा कंपनियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर बातचीत शुरू कर दी है। ‘स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस मुद्दे को हल करने के लिए अस्पतालों और बीमा कंपनियों के साथ बातचीत शुरू की है…’ इन वार्ताओं का मुख्य एजेंडा है – पुरानी पैकेज दरों का वैज्ञानिक ढंग से पुनर्मूल्यांकन करना और भुगतान प्रक्रिया को तेज व पारदर्शी बनाना।
कुछ राज्य पहले ही पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर कुछ प्रक्रियाओं की दरें बढ़ाने की तैयारी में हैं। साथ ही, क्लेम सेटलमेंट को 30 दिनों के भीतर लाने की बात भी चल रही है। यह सही दिशा में एक कदम है, लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने में अभी समय लगेगा।
अगर आपको अस्पताल इलाज से मना करे, तो क्या करें?
अगर आप या आपका कोई परिचित इस समस्या का सामना कर रहा है, तो हिम्मत न हारें। आपके पास शिकायत दर्ज करने के कई तरीके हैं। Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana के तहत आप ये कदम उठा सकते हैं: 1) अस्पताल प्रबंधन से लिखित में कारण मांगें। 2) तुरंत राज्य हेल्पलाइन 14555 या 104 पर कॉल कर शिकायत दर्ज करें। 3) आधिकारिक पोर्टल https://mera.pmjay.gov.in पर ऑनलाइन शिकायत करें। 4) अपने जिले के सीएमओ या स्वास्थ्य अधिकारी से सीधे संपर्क करें। याद रखें, यह आपका कानूनी अधिकार है। स्वास्थ्य बीमा का लाभ लेने से कोई आपको रोक नहीं सकता।
FAQs: ‘Ayushman Bharat Hospital Refusal: आपके सवाल, हमारे जवाब’
Q: क्या सभी प्राइवेट अस्पताल Ayushman Bharat मरीज लेने से मना कर रहे हैं?
Q: अस्पताल अगर मना कर दे, तो क्या मेरा Ayushman Bharat कार्ड बेकार है?
Q: सरकार इस समस्या को सुलझाने के लिए क्या कर रही है?
Q: क्या अस्पताल मरीज से पैसे लेकर बाद में क्लेम कर सकता है?
Q: 2026 के बाद Ayushman Bharat योजना का क्या भविष्य है?
निष्कर्ष: ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ का सपना क्या धूमिल होगा?
दोस्तों, यह Ayushman Bharat Hospital Refusal का संकट सिर्फ एक भुगतान का विवाद नहीं है। यह हमारे देश के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य मॉडल की परीक्षा का समय है। क्या सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर गरीब की सेहत की जिम्मेदारी उठा सकते हैं? क्या एक ऐसा संतुलन बन सकता है जहां अस्पतालों को नुकसान न हो और मरीजों को इलाज से वंचित न रहना पड़े?
2026 का यह 2026 स्वास्थ्य संकट हमें चेतावनी दे रहा है। ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ का सपना तभी साकार होगा, जब सरकार, निजी अस्पताल, बीमा कंपनियां और हम जैसे नागरिक मिलकर एक टिकाऊ समाधान खोजेंगे। योजना का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन उसके लिए आज सही कदम उठाना जरूरी है। आपकी जागरूकता और सक्रियता ही इस संकट से निपटने की पहली सीढ़ी है।

Editor-in-Chief • India Policy • LIC & Govt Schemes
Vikash Yadav is the Founder and Editor-in-Chief of Policy Pulse. With over five years of experience in
the Indian financial landscape, he specializes in simplifying LIC policies, government schemes, and
India’s rapidly evolving tax and regulatory updates. Vikash’s goal is to make complex financial
decisions easier for every Indian household through clear, practical insights.





