LIC पॉलिसी सरेंडर करना घाटे का सौदा है? 2026 के नए IRDAI सरेंडर वैल्यू नियम और एजेंट्स का छुपा सच

On: January 26, 2026 7:15 PM
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LIC पॉलिसी सरेंडर करना घाटे का सौदा है? 2026 के नए IRDAI सरेंडर वैल्यू नियम और एजेंट्स का छुपा सच

हाय दोस्तों! मुझे याद है मेरे एक रिश्तेदार की कहानी, जिन्हें कुछ साल पहले अचानक पैसे की जरूरत पड़ गई थी। उन्होंने अपनी 4 साल पुरानी LIC पॉलिसी सरेंडर कर दी। जो पैसा उन्हें मिला, वह उनके द्वारा भरे गए कुल प्रीमियम से बहुत कम था। वे बहुत निराश हुए और सोचने लगे कि उन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी। क्या आपकी कहानी भी कुछ ऐसी ही है? क्या आपकी LIC पॉलिसी अब एक बोझ लग रही है और एजेंट ने आपको सरेंडर करने से मना कर दिया है?

तो यह लेख सिर्फ आपके लिए है। 2026 में IRDAI (इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया) ने पॉलिसी सरेंडर वैल्यू के नियमों में बड़े बदलाव किए हैं। इन नए नियमों ने पूरा गणित बदल दिया है। यह लेख आपको बताएगा कि नए नियमों के तहत आपको क्या मिलेगा, आप खुद कैलकुलेशन कैसे कर सकते हैं, और सबसे जरूरी – एजेंट्स का वो ‘छुपा सच’ जो वे आपको नहीं बताते। चलिए, शुरू करते हैं।

पॉलिसी सरेंडर क्या है? यह आखिरी विकल्प कब होना चाहिए?

सीधे शब्दों में, पॉलिसी सरेंडर का मतलब है अपनी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी को मैच्योरिटी डेट से पहले ही बंद कर देना। ऐसा करने पर आपका बीमा कवर (Insurance Cover) खत्म हो जाता है और बदले में बीमा कंपनी आपको एक निश्चित राशि वापस कर देती है, जिसे सरेंडर वैल्यू कहते हैं। यह राशि आमतौर पर दो तरह की होती है: गारंटीड सरेंडर वैल्यू (GSV) जो पॉलिसी दस्तावेज में पहले से तय होती है, और स्पेशल सरेंडर वैल्यू (SSV) जो कंपनी अपने विवेक से दे सकती है।

पॉलिसी सरेंडर करना गंभीरता से तब विचार करना चाहिए जब: आप गंभीर वित्तीय संकट में हों और कोई दूसरा रास्ता न बचा हो; आपको पॉलिसी बिल्कुल फिट नहीं आ रही और उसके प्रीमियम से बेहतर निवेश के विकल्प मौजूद हों; या फिर पॉलिसी की शर्तें आपकी जरूरतों के अनुकूल न हों।

लेकिन एक बात याद रखें: सरेंडर हमेशा पहला विकल्प नहीं होना चाहिए। इससे पहले कि आप पॉलिसी बंद करने का फैसला करें, पॉलिसी लोन, पेड-अप वैल्यू (Paid-up Value) या प्रीमियम छूट (Premium Holiday) जैसे विकल्पों पर भी नजर डालें। इन पर हम आगे विस्तार से बात करेंगे।

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2026 के IRDAI नए सरेंडर वैल्यू नियम: क्या बदल गया है?

IRDAI ने 2026 से पॉलिसीधारकों के हित में कुछ बहुत ही अहम बदलाव किए हैं। पहले के नियम पॉलिसीधारक के मुकाबले कंपनी के पक्ष में ज्यादा थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। आइए इन IRDAI सरेंडर वैल्यू नियम 2026 के मुख्य बदलावों को समझते हैं।

पहला बड़ा बदलाव: पहले ज्यादातर पॉलिसियों में सरेंडर वैल्यू का लाभ तीसरे साल के बाद ही मिलना शुरू होता था। लेकिन नए अर्ली सरेंडर नियम के तहत, अब कई पॉलिसियों के लिए यह लाभ दूसरे वर्ष के बाद से ही मिलने लगेगा। इससे पॉलिसीधारकों को जल्दी राहत मिल सकेगी। [स्रोत]

दूसरा बड़ा बदलाव: यह सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है। नॉन-लिंक्ड, नॉन-पार्टिसिपेटिंग (NPNP) पॉलिसियों के लिए गारंटीड सरेंडर वैल्यू (GSV) को बढ़ाकर कुल प्रीमियम का 30% तक कर दिया गया है। पहले यह प्रतिशत काफी कम हुआ करता था। [स्रोत]

तीसरा बड़ा बदलाव: समग्र रूप से, इन नए नियमों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अब पॉलिसीधारक को समय से पहले पॉलिसी बंद करने पर पहले के मुकाबले अधिक राशि वापस मिले। यानी अब पॉलिसी सरेंडर करने का नुकसान पहले से कम हो गया है। [स्रोत]

पुराने नियम vs 2026 के नए IRDAI सरेंडर वैल्यू नियम
पैरामीटरपुराने नियम (2026 से पहले)2026 के नए नियम
सरेंडर वैल्यू पात्रताआमतौर पर 3 वर्ष बाद2 वर्ष बाद (कई पॉलिसियों के लिए)
गारंटीड सरेंडर वैल्यू (GSV)*कुल प्रीमियम का कम प्रतिशतकुल प्रीमियम का 30% तक (NPNP पॉलिसियों के लिए)
लाभपॉलिसीधारक को कम राशिपॉलिसीधारक को अधिक राशि वापसी की संभावना
उद्देश्यअर्ली एक्जिट को हतोत्साहित करनापॉलिसीधारक हित में न्यायसंगत एक्जिट

*NPNP: नॉन-पार्टिसिपेटिंग, नॉन-लिंक्ड पॉलिसियां

नए नियमों के तहत सरेंडर वैल्यू की गणना कैसे करें?

अपनी पॉलिसी का सरेंडर वैल्यू कैलकुलेशन करना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। चलिए, इसे स्टेप-बाय-स्टेप समझते हैं ताकि आप खुद अंदाजा लगा सकें कि आपको कितना पैसा मिल सकता है।

स्टेप 1: पॉलिसी प्रकार पहचानें
सबसे पहले यह जानें कि आपकी पॉलिसी किस प्रकार की है – क्या यह टर्म इंश्योरेंस, एंडोमेंट प्लान, मनी-बैक प्लान, या ULIP है? हर प्रकार के सरेंडर वैल्यू के अलग नियम होते हैं।

स्टेप 2: गारंटीड सरेंडर वैल्यू (GSV) का फॉर्मूला समझें
GSV का एक सामान्य फॉर्मूला होता है: (कुल प्रीमियम का एक निश्चित %) + (अर्जित बोनस, यदि लागू) – (कोई बकाया प्रीमियम या पॉलिसी लोन)। नए नियमों के तहत, NPNP पॉलिसियों के लिए यह ‘निश्चित %’ 30% तक है।

स्टेप 3: स्पेशल सरेंडर वैल्यू (SSV) को समझें
SSV कंपनी के विवेक पर होता है और यह पॉलिसी के फंड वैल्यू, कंपनी के मुनाफे और अन्य कारकों पर निर्भर करता है। यह GSV से अधिक हो सकता है, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं होती।

स्टेप 4: एक उदाहरण देखें
मान लीजिए आपकी 5 साल पुरानी एंडोमेंट पॉलिसी है और आपने अब तक कुल ₹2 लाख प्रीमियम भरा है। नए नियमों के तहत, अगर यह NPNP पॉलिसी है तो केवल GSV ही कुल प्रीमियम के 50% यानि लगभग ₹1 लाख के आसपास हो सकती है (पॉलिसी आयु के हिसाब से % बदलता है)। इसमें बोनस जोड़ा जाएगा और बकाया काटा जाएगा।

सबसे महत्वपूर्ण सलाह: इस सबका सबसे आसान तरीका है ऑनलाइन आधिकारिक सरेंडर वैल्यू कैलकुलेटर का उपयोग करना। LIC की अपनी वेबसाइट पर यह सुविधा उपलब्ध होती है। [स्रोत] हमेशा आधिकारिक कैलकुलेटर से मिले आंकड़े पर भरोसा करें, किसी अनुमान पर नहीं।

विभिन्न पॉलिसी आयु पर अनुमानित सरेंडर वैल्यू (कुल प्रीमियम का %)

यह चार्ट सांकेतिक है। वास्तविक मूल्य पॉलिसी प्रकार और शर्तों पर निर्भर करता है।

2 वर्ष (नए नियम)30%
3 वर्ष (पुराने नियम)20%
5 वर्ष (नए नियम)50%
7 वर्ष+ (नए नियम)70%

LIC पॉलिसी सरेंडर करना अब भी घाटे का सौदा है? एक तुलनात्मक विश्लेषण

सीधा जवाब है: हमेशा नहीं। नए नियमों ने पुराना समीकरण पूरी तरह बदल दिया है। अब यह केवल पॉलिसी की आयु और परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

परिदृश्य 1 (भारी घाटा): अगर आप पॉलिसी लेने के सिर्फ 1-2 साल बाद ही इसे सरेंडर करते हैं, तो यह अभी भी भारी नुकसान देगा। ऐसा इसलिए क्योंकि शुरुआती सालों में आपके प्रीमियम का एक बड़ा हिस्सा एजेंट कमीशन, पॉलिसी शुल्क और अन्य चार्जेज में चला जाता है।

परिदृश्य 2 (कम नुकसान या ब्रेक-ईवन): अगर आपकी पॉलिसी 5-7 साल पुरानी है, तो नए नियमों के तहत स्थिति अलग है। आपको अपने द्वारा जमा किए गए कुल प्रीमियम का एक अच्छा-खासा हिस्सा (50-70% तक) वापस मिल सकता है। यह पहले के मुकाबले कहीं बेहतर है।

परिदृश्य 3 (दूसरे विकल्पों से तुलना): एक और तरीका यह देखने का है कि अगर आपने वही पैसा किसी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) या म्यूचुअल फंड में लगाया होता तो क्या मिलता। कई बार एक खराब परफॉर्म कर रही पॉलिसी को सरेंडर करके पैसा निकालकर बेहतर जगह निवेश करना समझदारी हो सकती है।

निष्कर्ष यह है कि सरेंडर का फैसला केवल ‘हां या ना’ वाला सवाल नहीं रह गया है। यह आपकी पॉलिसी की आयु, उसके प्रकार, और आपकी तत्काल वित्तीय जरूरतों पर निर्भर एक गणितीय और रणनीतिक निर्णय बन गया है।

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बीमा एजेंट्स का छुपा सच: वे आपको पॉलिसी सरेंडर करने से क्यों रोकते हैं?

आपके एजेंट ने शायद आपसे कहा होगा, “सर, पॉलिसी मत सरेंडर करिए, यह आपके लिए बहुत बड़ा फाइनेंशियल लॉस है।” वे अक्सर आपकी भलाई का हवाला देकर सलाह देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस सलाह के पीछे उनके अपने कुछ निजी कारण भी हो सकते हैं? आइए जानते हैं बीमा एजेंट्स का सच

छुपा सच 1: क्लॉजबैक (Clawback) का डर
यह सबसे बड़ा कारण है। जब कोई एजेंट पॉलिसी बेचता है, तो उसे पहले साल के प्रीमियम का 30-40% तक मोटा कमीशन मिलता है। अगर पॉलिसी शुरुआती 2-3 साल में सरेंडर हो जाती है, तो बीमा कंपनी यह कमीशन एजेंट से वापस ले सकती है। इसे ही ‘क्लॉजबैक’ कहते हैं। [स्रोत] इसलिए, एजेंट आपको शुरुआती सालों में पॉलिसी बंद करने से रोकने की पूरी कोशिश करते हैं।

छुपा सच 2: रिन्यूअल कमीशन का नुकसान
एजेंट को सिर्फ पहले साल ही नहीं, बल्कि आपके द्वारा हर साल प्रीमियम जमा करवाने पर भी एक छोटा कमीशन (रिन्यूअल कमीशन) मिलता रहता है। अगर आप पॉलिसी सरेंडर कर देते हैं, तो यह कमीशन की नियमित आमदनी उनके लिए बंद हो जाती है।

छुपा सच 3: नई पॉलिसी बेचने का दबाव
कई बार एजेंट का इरादा अलग होता है। वे आपको पुरानी पॉलिसी सरेंडर करवाकर एक नई (और अक्सर ज्यादा प्रीमियम वाली) पॉलिसी बेचना चाहते हैं, ताकि उन्हें फिर से पहले साल का मोटा कमीशन मिल सके। यह आपके लिए दोहरा नुकसान हो सकता है।

अंतिम सलाह: एजेंट की बात को सम्मान से सुनें, क्योंकि वे इस फील्ड के एक्सपर्ट होते हैं। लेकिन अंतिम फैसला लेते समय अपनी गणना, आधिकारिक कैलकुलेटर के आंकड़े और अपनी वित्तीय जरूरतों को ही सबसे ज्यादा तरजीह दें।

सरेंडर करने से पहले याद रखें: विकल्प और अंतिम चेकलिस्ट

सरेंडर करने से पहले, यह जान लेना जरूरी है कि क्या कोई और रास्ता है? जी हां, कुछ विकल्प मौजूद हैं:
1. पॉलिसी लोन: LIC से ही पॉलिसी के सरेंडर वैल्यू के एक हिस्से तक का लोन ले सकते हैं। ब्याज दर कम होती है और बीमा कवर जारी रहता है।
2. प्रीमियम छूट (Premium Holiday): कुछ पॉलिसियों में आप कुछ समय के लिए प्रीमियम भरना बंद कर सकते हैं।
3. पेड-अप वैल्यू (Paid-up Value): प्रीमियम भरना बंद कर दें, लेकिन पॉलिसी पूरी तरह बंद न करें। बीमा कवर कम होकर बना रहेगा और मैच्योरिटी पर कुछ राशि मिलेगी।

सरेंडर से पहले की अंतिम चेकलिस्ट:
1. LIC से आधिकारिक सरेंडर वैल्यू का क्वोटेशन (फॉर्म 5074) जरूर लें।
2. सरेंडर वैल्यू पर टैक्स के प्रभाव को समझें (आमतौर पर प्रीमियम से अधिक राशि पर टैक्स लग सकता है)।
3. यह स्वीकार करें कि सरेंडर के साथ ही आपका बीमा कवर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
4. ऊपर बताए गए सभी विकल्पों पर एक बार फिर विचार करें।
5. अगर फिर भी संदेह हो, तो किसी स्वतंत्र वित्तीय सलाहकार (जो एजेंट न हो) से सलाह लें।

नए IRDAI सरेंडर वैल्यू नियम 2026 निश्चित रूप से पॉलिसीधारकों के हित में एक बड़ा कदम हैं। [स्रोत] इन्होंने पॉलिसीधारकों को अर्ली एक्जिट के समय अधिक न्यायसंगत मूल्य दिलाने की राह आसान की है।

FAQs: ‘पॉलिसी सरेंडर वैल्यू’

Q: क्या नई LIC पॉलिसी लेते समय मुझे सरेंडर वैल्यू के बारे में पूछना चाहिए?
A: हां, पॉलिसी खरीदने से पहले ही विभिन्न वर्षों में सरेंडर वैल्यू के बारे में पूछ लें। यह पारदर्शिता के लिए जरूरी है और भविष्य में आपको सही निर्णय लेने में मदद करेगा।
Q: क्या ULIP पॉलिसी का सरेंडर वैल्यू अलग होता है?
A: हां, ULIP का सरेंडर वैल्यू मुख्यतः उसके फंड की बाजार वैल्यू (NAV) पर निर्भर करता है। पांच साल के लॉक-इन से पहले सरेंडर पर भारी चार्जेस लगते हैं।
Q: पॉलिसी सरेंडर करने पर क्या टैक्स लगता है?
A: यदि प्राप्त सरेंडर वैल्यू कुल प्रीमियम से अधिक है, तो अधिक राशि पर ‘इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज’ के तहत टैक्स लग सकता है। सटीक जानकारी के लिए टैक्स सलाहकार से पूछें।
Q: अगर मैं प्रीमियम भरना बंद कर दूं तो क्या होगा? क्या यह सरेंडर जैसा है?
A: नहीं, प्रीमियम बंद करना सरेंडर नहीं है। इससे पॉलिसी लैप्स हो सकती है या ‘पेड-अप’ वैल्यू में बदल सकती है, जहां बीमा कवर कम होकर बना रहता है।
Q: क्या ऑनलाइन पॉलिसी सरेंडर करवाना सेफ है?
A: LIC की आधिकारिक वेबसाइट या ऐप के जरिए ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू करना सुरक्षित है। लेकिन फाइनल क्वोटेशन और डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के लिए आधिकारिक चैनलों का ही इस्तेमाल करें।

निष्कर्ष

तो दोस्तों, आइए जो समझा उसे संक्षेप में दोहरा लें। पहली बात: 2026 के IRDAI के नए नियम पॉलिसीधारक के पक्ष में हैं और सरेंडर वैल्यू पहले से बेहतर कर दी गई है। दूसरी बात: अब सरेंडर हमेशा घाटे का सौदा नहीं रहा, खासकर अगर पॉलिसी 5-7 साल पुरानी हो। तीसरी बात: यह समझना जरूरी है कि आपके एजेंट के हित कई बार आपके हितों से अलग हो सकते हैं।

अंत में, बस इतना कहना चाहूंगा कि ‘सरेंडर’ शब्द से डरने की जरूरत नहीं है। यह एक वित्तीय निर्णय है, जिसे तथ्यों, गणना और अपनी जरूरतों के आधार पर लेना चाहिए, न कि भावनाओं या किसी के दबाव में आकर। अपनी पॉलिसी के दस्तावेज निकालिए, ऑनलाइन कैलकुलेटर से इसका मूल्य पता कीजिए, और तभी कोई कदम उठाइए जब यह आपकी वित्तीय योजना में सही बैठता हो। और हां, अगर यह जानकारी आपको उपयोगी लगी, तो इसे उन दोस्तों और परिवारजनों के साथ जरूर शेयर करें जो LIC पॉलिसी रखते हैं। शुभकामनाएं!

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VIKASH YADAV

Editor-in-Chief • India Policy • LIC & Govt Schemes Vikash Yadav is the Founder and Editor-in-Chief of Policy Pulse. With over five years of experience in the Indian financial landscape, he specializes in simplifying LIC policies, government schemes, and India’s rapidly evolving tax and regulatory updates. Vikash’s goal is to make complex financial decisions easier for every Indian household through clear, practical insights.

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